एक बुजुर्ग पिता की आंखों में बेबसी। चेहरे पर दर्द। और दिल में टूटी हुई उम्मीदें। एक मां अपने बेटे के चेहरे को सहलाती हुई — जैसे उसे जगाने की आखिरी कोशिश कर रही हो।
यह महज कोई दर्दनाक तस्वीर नहीं है। यह एक परिवार की 13 साल लंबी पीड़ा की कहानी है। यह कहानी है गाजियाबाद के हरीश राणा की — एक ऐसे बेटे की जो जिंदा तो है, लेकिन जीवन से बहुत दूर जा चुका है। और यह कहानी है उस फैसले की, जिसे कोई भी मां-बाप कभी लेना नहीं चाहता — इच्छा मृत्यु।

🎓 कौन हैं हरीश राणा?
गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा कभी एक होनहार छात्र थे। पंजाब यूनिवर्सिटी से B.Tech कर रहे थे, पढ़ाई में टॉपर थे और सपने बहुत बड़े थे।
लेकिन 2013 में एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया। वे हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इस हादसे के बाद उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया। डॉक्टरों ने इसे Quadriplegia बताया — यानी शरीर का कोई हिस्सा काम नहीं करता। ना हाथ, ना पैर, ना आवाज। बस सांसें चलती रहती हैं — मशीनों और ट्यूब्स के सहारे।
💔 13 साल की लड़ाई
इन 13 सालों में परिवार ने हर संभव इलाज करवाया। पैसा खत्म हो गया। जमीन-जायदाद बिक गई। लेकिन उम्मीद नहीं टूटी। हर दिन एक ही सवाल के साथ शुरू होता — “शायद आज कोई चमत्कार हो जाए।”
लेकिन चमत्कार नहीं हुआ। बिस्तर पर पड़े-पड़े शरीर में इतने गहरे घाव बन गए कि देखना मुश्किल था। हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई। और सबसे मुश्किल यह — यह सब अपनी आंखों के सामने देखना।
यहीं से शुरू हुई वो लड़ाई — जो कोर्ट तक पहुंची।

⚖️ क्या होती है इच्छा मृत्यु?
आसान भाषा में — जब किसी ऐसे मरीज को, जिसकी बीमारी लाइलाज हो चुकी हो और जो असहनीय पीड़ा में हो, कृत्रिम सहारे पर जिंदा रखने के बजाय प्राकृतिक रूप से जाने दिया जाए — इसे इच्छा मृत्यु (Euthanasia) कहते हैं।
भारत में इसके दो रूप हैं:
- Active Euthanasia — दवा देकर मौत। यह गैरकानूनी है।
- Passive Euthanasia — इलाज या लाइफ सपोर्ट धीरे-धीरे बंद करना। यह कुछ शर्तों के साथ मान्य है।
🏛️ कोर्ट तक का सफर
2024 में हरीश के माता-पिता दिल्ली हाई कोर्ट गए। उन्होंने मांग की कि हरीश को दी जा रही feeding और hydration बंद करने की अनुमति दी जाए। लेकिन अदालत ने मना कर दिया — क्योंकि हरीश ventilator पर नहीं थे और पुराने कानूनों के हिसाब से उन्हें “terminal case” नहीं माना गया।
लेकिन परिवार रुका नहीं। उन्होंने दरवाजा खटखटाया देश की सबसे बड़ी अदालत — सुप्रीम कोर्ट — का।

📅 11 मार्च 2026 — ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच — Justice JP Pardiwala और Justice KV Viswanathan — ने एक बड़ा फैसला सुनाया।
कोर्ट ने कहा:
“सिर्फ ventilator पर होना जरूरी नहीं। अगर कोई व्यक्ति ट्यूब के सहारे (Clinically Assisted Nutrition and Hydration) जिंदा है, तो उसे भी Passive Euthanasia के दायरे में माना जाएगा।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह फैसला Right to Die with Dignity — यानी सम्मान के साथ मरने के अधिकार — के तहत आता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है।
AIIMS को निर्देश दिया गया कि पूरी प्रक्रिया बेहद सावधानी और गरिमा के साथ पूरी की जाए।
🔬 आगे क्या हुआ?
कोर्ट के आदेश के बाद एक धीमी, सोची-समझी प्रक्रिया शुरू हुई:
- पहले feeding tube से खाना बंद किया गया
- फिर धीरे-धीरे पानी देना भी रोका गया
- ऑक्सीजन सपोर्ट पहले से ही नहीं था
यह दो से तीन हफ्तों की प्रक्रिया है — जहां शरीर धीरे-धीरे प्रकृति के हवाले हो जाता है।
📜 भारत में इच्छा मृत्यु का इतिहास
अरुणा शानबाग केस (2011)
मुंबई के KEM अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग पर 1973 में हमला हुआ और वे कोमा में चली गईं। 2009 में पत्रकार पिंकी विरानी ने उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने पहली बार माना कि कुछ परिस्थितियों में Passive Euthanasia की अनुमति दी जा सकती है — लेकिन अरुणा को इजाजत नहीं दी गई क्योंकि वे बिना ventilator के खुद सांस ले पा रही थीं। 2015 में उनकी प्राकृतिक मृत्यु हुई।
Common Cause Case (2018)
2005 में दायर याचिका पर 9 मार्च 2018 को पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया — अगर कोई मरीज लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो और सिर्फ life support के सहारे जिंदा हो, तो इलाज रोककर उसे प्राकृतिक मृत्यु दी जा सकती है। इसी फैसले में Living Will की अवधारणा भी सामने आई — जहां कोई व्यक्ति पहले से लिखकर जाए कि किसी असाध्य स्थिति में उसे life support पर न रखा जाए।
🌍 दुनिया में इच्छा मृत्यु की स्थिति
| देश | स्थिति |
|---|---|
| 🇨🇭 स्विट्जरलैंड | 1942 से Assisted Dying कानूनी — Dignitas जैसी संस्थाएं विदेशियों को भी सुविधा देती हैं |
| 🇳🇱 नीदरलैंड्स | 2002 से कानूनी — 12 साल से ऊपर के बच्चे भी शर्तों के साथ यह विकल्प चुन सकते हैं |
| 🇧🇪 बेल्जियम | 2002 से कानूनी — 2014 के बाद गंभीर रूप से बीमार बच्चों को भी अनुमति |
| 🇨🇦 कनाडा | 2016 से MAID (Medical Assistance in Dying) कानून — बाद में लाइलाज मरीजों तक भी विस्तार |
| 🇺🇸 अमेरिका | पूरे देश में नहीं — Oregon (1997), California, Washington समेत कुछ राज्यों में सीमित अनुमति |
| 🇦🇺 ऑस्ट्रेलिया | 2019 में Victoria से शुरुआत — अब अधिकांश राज्यों में Voluntary Assisted Dying की अनुमति |
| 🇪🇸 स्पेन | 2021 से कानूनी — लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे लोग यह विकल्प चुन सकते हैं |
| 🇷🇺 रूस | पूरी तरह गैरकानूनी — डॉक्टर को भी सजा हो सकती है |
| 🇵🇰 पाकिस्तान | पूरी तरह प्रतिबंधित |
| 🇮🇳 भारत | Passive Euthanasia — 2018 से शर्तों के साथ मान्य। Active Euthanasia अवैध। |
💭 असली सवाल
क्या किसी इंसान को अपने जीवन का अंत चुनने का अधिकार होना चाहिए? क्या दर्द से मुक्ति जीवन से ज्यादा जरूरी हो सकती है?
शायद इसका कोई एक जवाब नहीं है। लेकिन कुछ सच्चाइयां साफ दिखती हैं — जब जीवन सिर्फ मशीनों पर निर्भर हो, जब सुधार की कोई संभावना न हो, जब दर्द और पीड़ा ही बची हो, तब शायद मृत्यु भी एक दया बन जाती है।
Justice Pardiwala ने फैसला सुनाते हुए Shakespeare के नाटक Hamlet की वह मशहूर पंक्ति दोहराई —
“To be, or not to be…” — होना या ना होना।
कभी-कभी अदालतों को भी इन्हीं सवालों के बीच फैसला लेना पड़ता है।
और इस फैसले ने एक बात साफ कर दी — हर इंसान को सिर्फ जीने का नहीं, बल्कि सम्मान के साथ मरने का भी अधिकार है।
आपका इस पूरे मसले पर क्या सोचना है? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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